✍️✍️रविन्द्र राठौर : कलयुग में 'भक्ति' ही भगवान को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग — रासेश्वरी देवी
Ten Singh Thakur
Thu, Oct 8, 2026
जांजगीर 8अक्टूबर। जगद्गुरु कृपालु जी महाराज की प्रमुख प्रचारिका, पूजनीया रासेश्वरी देवी जी ने ज्ञानयोग और भक्तियोग के सूक्ष्म दार्शनिक भेदों को अत्यंत सरलता से स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि कोरे ज्ञान से नहीं, अपितु भक्ति के माध्यम से प्राप्त ईश्वरीय प्रेम ही मनुष्य का सर्वोच्च लक्ष्य है।
देवी जी ने बताया कि भगवान के 'सच्चिदानंद' स्वरूप के आधार पर शास्त्रों में कर्म, ज्ञान और भक्ति, ये तीन ही मार्ग बताए गए हैं। ज्ञान मार्ग की जटिलताओं को समझाते हुए उन्होंने कहा कि एक ज्ञानी अपने बल से तमोगुण और रजोगुण को जीतकर 'निर्विकल्प समाधि' तक पहुँच सकता है, किंतु वह सत्वगुण को स्वयं नहीं जीत सकता। विद्या माया को पार करने के लिए ज्ञानियों को भी अंततः भगवान की शरण में जाकर उनकी भक्ति करनी पड़ती है। अद्वैतवाद के प्रवर्तक आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने भी इसी कारण सगुण साकार ब्रह्म श्रीकृष्ण की भक्ति की थी।
ज्ञानी और भक्त के आनंद में अंतर स्पष्ट करते हुए उन्होंने एक अत्यंत सटीक उदाहरण दिया। ज्ञानी का 'ब्रह्मानंद' गुड़ की चाय के समान है, जबकि भक्त का 'प्रेमानंद' मिश्री की चाय के समान अधिक मधुर और विलक्षण है। यही कारण है कि राजा जनक, शुकदेव परमहंस और उद्धव जैसे सर्वोच्च ज्ञानी भी ज्ञान का ब्रह्मानंद छोड़कर भक्ति के प्रेमानंद में डूब गए। देवी जी ने यह भी स्पष्ट किया कि ज्ञान के लिए अलग से प्रयास करने की आवश्यकता नहीं होती; भगवान की सच्ची भक्ति करने से ज्ञान और वैराग्य स्वतः ही उत्पन्न हो जाते हैं।
कलियुग के जीवों के लिए भक्ति मार्ग की अनिवार्यता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि पूर्ण विरक्त मनुष्य ज्ञान मार्ग का अधिकारी है और घोर आसक्त मनुष्य कर्म मार्ग का। किंतु हम संसारी जीव न तो पूर्णतः आसक्त हैं और न ही पूर्णतः विरक्त। अनुकूल व्यवहार मिलने पर हमारी आसक्ति बढ़ जाती है और परिवार से तनिक भी प्रतिकूल व्यवहार मिलने पर हम तुरंत विरक्त हो जाते हैं। ऐसी चंचल अवस्था वाले जीवों के लिए 'भक्ति मार्ग' ही सबसे सुलभ और सर्वश्रेष्ठ मार्ग बताया गया है, जिसके हम सभी अधिकारी हैं।
Tags :
विज्ञापन
विज्ञापन
जरूरी खबरें
विज्ञापन