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✍️✍️रविन्द्र राठौर : बुद्धि और तर्क से नहीं, शत-प्रतिशत शरणागति और ईश्वरीय कृपा से मिलते हैं भगवान: रासेश्वरी देवी जी

जांजगीर में आयोजित 'उपनिषद ज्ञानामृत' दार्शनिक प्रवचन श्रृंखला में जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख प्रचारिका, पूजनीया रासेश्वरी देवी जी ने अज्ञानता, कर्म की स्वतंत्रता और भगवत कृपा के संबंध में अत्यंत गूढ़ रहस्य श्रोताओं के समक्ष प्रकट किए।

अज्ञानता और भगवान की कृपा: देवी जी ने बताया कि हम मूलतः 'आत्मा' हैं, आत्मा नित्य है, उसकी मृत्यु नहीं होती| फिर भी अज्ञानता के कारण हम मृत्यु से डरते हैं। भगवान सदा से हमारे हृदय में हैं, लेकिन इसी अज्ञानता ने उनसे हमारी दूरी बना रखी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान को सीमित 'बुद्धि' या मात्र शास्त्रों के 'प्रवचन' सुनकर नहीं जाना जा सकता; प्रवचन केवल मार्गदर्शन करते हैं। जब तक हम उन सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप से जीवन में नहीं उतारते (साधना नहीं करते), तब तक बात नहीं बनती। जैसे अर्जुन का अज्ञान केवल गीता का ज्ञान सुनने से नहीं, बल्कि श्री कृष्ण की 'कृपा' से दूर हुआ था।

माया और संत-मिलन भी भगवान की कृपा पर आधारित: कुछ लोग सोचते हैं कि वे अपनी शक्ति से 'माया' को जीत लेंगे, लेकिन माया भगवान की अत्यंत प्रबल शक्ति है, जिसे केवल भगवान की कृपा से ही जीता जा सकता है। यहाँ तक कि किसी सच्चे (भगवत प्राप्त) संत का सानिध्य पाना केवल शास्त्रों के ज्ञान से संभव नहीं, सच्चे संत भी भगवान की कृपा से ही मिलते हैं।

अपने कर्मों के लिए मनुष्य स्वयं जिम्मेदार है: जो लोग यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि "बिना भगवान की इच्छा के पत्ता भी नहीं हिलता, तो जब भगवान चाहेंगे तब भक्ति कर लेंगे", वे भारी भ्रम में हैं। देवी जी ने तर्क देते हुए कहा कि यदि भगवान ही हमारे प्रत्येक कर्म के लिए जिम्मेदार होते, तो कोई जीव गलत कार्य नहीं करता और शास्त्रों में 'क्या करें और क्या न करें' (विधि-निषेध) का कोई विधान ही नहीं होता।

इस संबंध में उन्होंने 'प्रयोजक कर्ता' और 'प्रयोज्य कर्ता' का सुंदर भेद बताया। भगवान केवल 'प्रयोजक कर्ता' हैं, जो हमें कार्य करने की शक्ति (आत्मा/चेतना) देते हैं। लेकिन, हम 'प्रयोज्य कर्ता' हैं| भगवान ने हमें कर्म करने की पूर्ण स्वतंत्रता दी है। भगवान द्वारा दी गई इस शक्ति (जैसे कानों की सुनने की शक्ति) से हम सत्संग सुनते हैं या निंदा, यह पूरी तरह हमारी अपनी इच्छा पर निर्भर है। अतः अपने शुभ या अशुभ कर्मों के लिए जीव स्वयं जिम्मेदार है, भगवान नहीं।

प्रवचन के अंत में देवी जी ने एक गहरी जिज्ञासा छोड़ी — यदि भगवान केवल अपनी कृपा से ही मिलते हैं, तो आखिर वह 'भगवत कृपा' क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जा सकता है?

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